Real Story of Pangi Valley: पांगी का वह चमत्कारी पुजारी, जिसने 9 फीट बर्फ में चहेंणी जोत लांघकर मिंधल में मनाया खौउल उत्सव
- जमीनी विवाद और कोर्ट की वो जरूरी पेशी
Real Story of Pangi Valley: हिमाचल प्रदेश के चंबा जिले का जनजातीय क्षेत्र पांगी घाटी इन दिनों आस्था और उत्साह खौउल मेला मनाया जा रहा है। घाटी में ऐतिहासिक खौउल उत्सव, जिसे स्थानीय बोली में चजगी भी कहा जाता है, इस इन दिनों धूमधाम से मनाया जा रहा है। चारों तरफ बर्फ की सफेद चादर है और लोग पारंपरिक खौउल उत्सव मनाया जा रहा है। आज हम आपको एक ऐसी कहानी से अगवत करवाने जा रहे है जिस पर यकिन करना संभव नहीं है। लेकिन यह एक सच्ची घटन है। आज से करीब 80 साल पहले मिंधल माता मंदिर के एक पुश्तैनी पुजारी स्वर्गीय जैदास से 9 फीट बर्फ में, बिना आधुनिक उपकरणों के मौत के दर्रे को पार कर मिंधल गांव में खौउल उत्सव मनाने पहुंचा हुआ था।
जमीनी विवाद और कोर्ट की वो जरूरी पेशी
यह घटना 80 साल पुरानी बताई जाती है। उस समय पांगी घाटी में न तो आज जैसी सड़कें थीं और न ही संचार के साधन। फरवरी का महीना यानी माघ माह चल रहा था। मिंधल गांव के रहने वाले पुजारी जैदास और उन्हीं के गांव के चिड़ीदास के बीच एक जमीनी विवाद चल रहा था। यह विवाद हुरोग नाम की जमीन को लेकर था, जिसका मामला चंबा कोर्ट में विचाराधीन था। पुजारी जैदास के लिए यह पेशी भुगतना अनिवार्य था, लेकिन साथ ही खौउल उत्सव के लिए समय पर गांव लौटना भी उनकी धार्मिक जिम्मेदारी थी। जैदास चंबा पहुंचे, अदालत में पेशी भुगुती और अपनी गवाही दी। काम खत्म होते ही उनके मन में अपने गांव और आराध्य देवी के पास लौटने की बेचैनी शुरू हो गई। वे तुरंत पांगी के लिए निकल पड़े। जब वे चंबा से चले तो मौसम शांत था, लेकिन पहाड़ों का मौसम कब करवट बदल ले, कोई नहीं जानता। चुराह घाटी के देवीकोठी माता मंदिर तक पहुँचते-पहुँचते आसमान का रंग बदल गया। काले बादलों ने सूरज को निगल लिया और भारी हिमपात शुरू हो गया।
स्थानीय लोग बताते हैं कि उस दिन इतनी बर्फ गिरी कि रास्ते गायब हो गए। लेकिन जैदास नहीं रुके। वे पांगी की पारंपरिक वेशभूषा ऊनी कोट, ऊनी पजामा (चलण), सिर पर सफेद टोपी और पैरों में घास के बने जूते (पूलें) पहनकर आगे बढ़ते रहे। हेल गांव पार करते-करते बर्फ घुटनों तक आ चुकी थी। वहां से आगे चहेंणी जोत के समीप पहुंचते ही उन्होंने रवास नामक स्थान पर गुफा के भीतर आग जलाकर उन्होंने एक रात बिताने की सोची जैसे ही अगली सुबह हुई तो उनके लिए असली परीक्षा अभी बाकी थी। उनके सामने खड़ा था 11,000 फीट ऊंचा चहेंणी जोत पार करना था । यह वो दर्रा है जिसे सर्दियों में पार करना आज भी मौत को दावत देने जैसा है। उस समय वहां करीब 9 फीट बर्फ पड़ी थी। बर्फीले तूफान में जैदास के पैर डगमगाने लगे। शरीर सुन्न पड़ गया और सांसें फूलने लगीं। एक पल ऐसा आया जब उन्हें लगा कि अब यही बर्फ उनकी कब्र बनेगी।
जब जीवन की डोर छूटने लगी, तब पुजारी ने अपनी कुलदेवी मां मिंधल वासनी को पुकारा। उन्होंने प्रार्थना की कि “हे मां! अगर मैं यहाँ मर गया, तो तेरी पूजा कौन करेगा? खौउल का उत्सव अधूरा रह जाएगा। परिजनों और बुजुर्गों के अनुसार, तभी वहां एक चमत्कार हुआ। सफेद बर्फ के बीच अचानक कुत्तर शंक नामक स्थान पर जोर का तुफान चला और नौ कन्या और एक विशालकाय बाघ प्रकट हुआ। पुजारी की आंखें फटी की फटी रह गईं। उसी वक्त वहां एक छोटी कन्या रूट में प्रकट हुई साक्षात मिंधल माता थीं। माता ने अपने भक्त की दशा देखी और कहा, घबरा मत, मेरा वाहन (बाघ) तुझे घर पहुंचाएगा।” माता ने एक शर्त रखी- “बाघ की पीठ पर बैठ जा, लेकिन याद रखना, जब तक तू अपने घर मिंधल भटवास नहीं पहुंच जाता, पीछे मुड़कर मत देखना। पुजारी कांपते हाथों से बाघ पर सवार हुए। कहा जाता है कि बाघ ने हवा की गति से दौड़ना शुरू किया। ऊबड़-खाबड़ पहाड़ियां, गहरी खाइयां और 9 फीट बर्फ- सब कुछ पीछे छूटता गया। कुछ ही घंटों में पुजारी जैदास मिंधल गांव से महज कुछ दूरी पर िस्थत वरन्यू गांव पहुंच गए। वहां पर वह फिर स्थानीये लोगों से मिले। उसके बाद अपने घर मिंधल भटवास पहुंचते तो तुरंत स्नान किया और खौउल उत्सव की रस्में निभाने मंदिर पहुंच गए। गांव वाले हैरान थे कि इतनी भारी बर्फबारी में, जब परिंदा भी पर नहीं मार सकता, जैदास चंबा से वापस कैसे आ गए?
शुरुआत में लोगों ने इसे जैदास का भ्रम या मनगढ़ंत कहानी माना। लेकिन इस कहानी में एक ऐसा मोड़ है जो तर्कशास्त्रियों को भी सोचने पर मजबूर कर देता है। मौजूदा समय में मिंधल माता के पुश्तैनी पुजारी बुधीराम ने इस घटना से जुड़े कुछ अहम सबूत उनके पास है। उनके पास भोजपत्र पर लिखी इबारत और कोर्ट के कुछ पुराने कागज शामिल हैं। इन कागजों में साफ जैदास चंबा कोर्ट में पेश हुए थे। वह तारीख खौउल उत्सव से महज एक या दो दिन पहले की थी। चंबा से पांगी की दूरी और उस समय की भयानक बर्फबारी को देखते हुए, किसी भी इंसान के लिए पैदल इतने कम समय में लौटना भौगोलिक और शारीरिक रूप से असंभव था।
