Success Story : हिमाचल की इस रिटायरमेंट शिक्षिका ने खेती में लगाए 50 हजार और कमाए 5 लाख; पढ़िए सावित्री की अनोखी कहानी
ऊना: हिमाचल प्रदेश के ऊना जिले की रहने वाली सावित्री ने वह कर दिखाया है, जो किसी भी रिटायर व्यक्ति के लिए एक मिसाल बन चुका है। पेशे से शारीरिक शिक्षा की शिक्षिका रहीं सावित्री ने शिक्षा विभाग में अपनी जिंदगी के लगभग 40 बेशकीमती साल दिए। आमतौर पर लोग रिटायरमेंट के बाद केवल अपनी पेंशन (Pension) के भरोसे आराम की जिंदगी गुजारना पसंद करते हैं, लेकिन सावित्री ने एक अलग और साहसी रास्ता चुना। उन्होंने ₹50,000 के छोटे से निवेश से प्राकृतिक खेती की शुरुआत की और आज वह साल के ₹5 लाख तक का मुनाफा कमा रही हैं।
बेटी की सलाह और सावित्री का बड़ा फैसला
सावित्री के इस सफर की शुरुआत भी बड़ी दिलचस्प है। पहले वे भी आम किसानों की तरह रसायनों और कीटनाशकों का भरपूर इस्तेमाल करती थीं। लेकिन एक दिन उनकी बड़ी बेटी, जो एक मशहूर कार्डियोलॉजिस्ट (दिल की डॉक्टर) हैं, ने उन्हें सचेत किया। बेटी ने साफ कहा कि जो जहर हम खेतों में डाल रहे हैं, वही बीमारियों की जड़ बनकर हमारे शरीर में जा रहा है। यह बात सावित्री के दिल को लग गई। उन्होंने महसूस किया कि सिर्फ पेंशन (Pension) बटोरना ही काफी नहीं है, बल्कि समाज को स्वस्थ भोजन देना उनकी नैतिक जिम्मेदारी है। उसी पल उन्होंने रसायनों को त्याग कर जहर मुक्त खेती का संकल्प लिया।
प्राकृतिक खेती के तीन ‘ब्रह्मास्त्र’ फॉर्मूले
सावित्री ने अपनी इस नई पारी के लिए राजस्थान के भरतपुर जाकर प्राकृतिक खेती की विधिवत ट्रेनिंग ली। वहां उन्होंने जीवामृत, नीमास्त्र और ब्रह्मास्त्र जैसे तीन जादुई फॉर्मूले सीखे, जो खेती में खाद और कीटनाशकों के खर्च को लगभग खत्म कर देते हैं। वे गाय के गोबर, गौमूत्र, गुड़ और बेसन की मदद से खुद घर पर ही उच्च गुणवत्ता वाली खाद तैयार करती हैं। उनका स्पष्ट मानना है कि जब खेती की सामग्री घर में ही उपलब्ध हो, तो किसान को अपनी पेंशन (Pension) का पैसा महंगे फर्टिलाइजर कंपनियों पर लुटाने की कोई जरूरत नहीं पड़ती। उनकी इस ‘शून्य बजट खेती’ को देख आज क्षेत्र के बड़े-बड़े विशेषज्ञ भी हैरान हैं।
कमाई का गणित: 50 हजार लगाओ, 5 लाख पाओ
आज सावित्री करीब 10 कनाल जमीन पर गेहूं, मक्का, अलसी और कई तरह के फलों की बागवानी कर रही हैं। उनकी सबसे बड़ी खूबी ‘इंटरक्रॉपिंग’ है, यानी वह एक ही खेत में एक साथ कई फसलें उगाती हैं ताकि मिट्टी का पोषण बना रहे। जहाँ बाजार में साधारण गेहूं सस्ते दाम पर बिकता है, वहीं उनका प्राकृतिक गेहूं ₹6,000 प्रति क्विंटल तक के ऊंचे रेट पर बिक रहा है। उन्होंने साबित कर दिया है कि बुढ़ापे में केवल पेंशन (Pension) पर निर्भर रहने के बजाय, मेहनत और सही तकनीक का इस्तेमाल कर मिट्टी से सोना पैदा किया जा सकता है। आज वे ब्लॉक लेवल पर मास्टर ट्रेनर के रूप में हजारों युवाओं को स्वरोजगार की नई दिशा दिखा रही हैं।
उम्र केवल एक नंबर है: सावित्री का संदेश
सावित्री के पति भी एक रिटायर शिक्षक हैं और इस अभियान में वे कंधे से कंधा मिलाकर उनका साथ देते हैं। उनकी कहानी उन सभी लोगों के लिए एक सबक है जो सोचते हैं कि 60 की उम्र के बाद करियर खत्म हो जाता है। सावित्री का कहना है कि सीखने की कोई उम्र नहीं होती और अगर आपमें जज्बा है, तो सफलता जरूर मिलेगी। आज उनके घर में न केवल शुद्ध और पौष्टिक भोजन आता है, बल्कि आर्थिक समृद्धि भी बढ़ी है, जिससे उन्हें अपनी सरकारी पेंशन (Pension) पर पहले जैसी निर्भरता महसूस नहीं होती। यह मॉडल न केवल स्वास्थ्य सुधारता है बल्कि पर्यावरण के प्रति हमारी जिम्मेदारी को भी पूरा करता है।
